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Reading: हिमालय की चेतावनी को कब तक अनसुना करेंगे?
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Hindavi Tarangini > Blog > हिमालय की चेतावनी को कब तक अनसुना करेंगे?
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हिमालय की चेतावनी को कब तक अनसुना करेंगे?

Akshat Jain
Last updated: September 9, 2026 8:55 am
Akshat Jain
Published: September 3, 2026
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हिमालय बार-बार चेतावनी दे रहा है। कभी पहाड़ दरकते हैं, कभी नदियां अपने रास्ते बदल देती हैं, कभी बादल कुछ घंटों में वर्षों की बसाहट बहा ले जाते हैं और कभी किसी छोटे से गांव तक पहुंचने वाली सड़क ही आपदा के बाद जीवन और मृत्यु के बीच की आखिरी कड़ी बन जाती है। नेपाल में आई आपदा ने एक बार फिर इस कठोर सच्चाई को सामने रखा है कि हिमालय को केवल भौगोलिक सीमा या पर्यटन का आकर्षण समझने की भूल अब महंगी पड़ सकती है। नेपाल की त्रासदी को यदि हम सिर्फ पड़ोसी देश की समस्या मानकर आगे बढ़ गए तो यह हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। हिमालय एक साझा पारिस्थितिकी तंत्र है। उसकी भौगोलिक बनावट, जलवायु, ग्लेशियर, नदियां और भूगर्भीय अस्थिरता किसी राजनीतिक सीमा को नहीं पहचानतीं। नेपाल में जो हो रहा है, उसका सबक उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। सवाल यह नहीं है कि अगली आपदा कब आएगी। सवाल यह है कि जब आएगी तब हम कितने तैयार होंगे? यही वह प्रश्न है, जिससे उत्तराखंड को अब आंख मिलाकर बात करनी होगी।
उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति उसे विकास और आपदा के बीच एक असाधारण संतुलन की चुनौती देती है। एक तरफ तेजी से बढ़ते शहर हैं, पर्यटन का विस्तार है, चारधाम यात्रा का बढ़ता दबाव है, सड़क और सुरंग परियोजनाएं हैं, जलविद्युत परियोजनाएं हैं और दूसरी तरफ बेहद संवेदनशील पर्वतीय ढलान, सक्रिय भूगर्भीय क्षेत्र, ग्लेशियर और तेजी से बदलता मौसम है। इन दोनों के बीच यदि वैज्ञानिक समझ कमजोर पड़ती है तो विकास स्वयं आपदा का जोखिम बढ़ाने लगता है। जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर की वैज्ञानिक चेतावनी नहीं है। इसका असर हिमालय के तापमान, हिमनदों, वर्षा के स्वरूप और जलचक्र में दिखाई दे रहा है। बारिश कब होगी, कितनी होगी और कितने कम समय में होगी—इन सवालों के जवाब पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित होते जा रहे हैं। पहाड़ों के लिए यह बदलाव और गंभीर है। पारंपरिक रूप से होने वाली बारिश और कुछ घंटों में अत्यधिक वर्षा होने की स्थिति में जमीन पर पड़ने वाला दबाव अलग होता है। जब कम समय में बड़ी मात्रा में पानी पहाड़ पर गिरता है तो ढलानों की स्थिरता प्रभावित होती है, नाले उफनते हैं, मलबा नीचे आता है और सड़कें तथा पुल इसकी पहली कीमत चुकाते हैं। लेकिन आपदा केवल सड़क या पुल टूटने तक सीमित नहीं रहती। इसके बाद शुरू होती है दूसरी चुनौती—स्वास्थ्य की।
नेपाल की आपदा से सबसे बड़ा सबक यह भी है कि प्राकृतिक आपदा समाप्त होने के साथ संकट समाप्त नहीं होता। बाढ़, भूस्खलन और मलबे के बाद दूषित पानी, खराब स्वच्छता, भोजन की कमी, शवों का उचित प्रबंधन, स्वास्थ्य केंद्रों का बाधित होना और लोगों का अस्थायी शिविरों में रहना संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है।
यही स्थिति उत्तराखंड में भी पैदा हो सकती है। कल्पना कीजिए कि किसी पर्वतीय क्षेत्र में बड़ी आपदा के बाद सड़क संपर्क टूट गया। बिजली और मोबाइल नेटवर्क बाधित हो गए। पेयजल स्रोत मलबे से दूषित हो गए और स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र स्वयं क्षतिग्रस्त हो गया। ऐसे में बीमारी का इलाज अस्पताल पहुंचने से पहले ही एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। इसलिए आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल राहत सामग्री पहुंचाना नहीं होना चाहिए। इसमें आपदा के बाद स्वास्थ्य सुरक्षा की पूरी रणनीति शामिल होनी चाहिए। उत्तराखंड के संवेदनशील क्षेत्रों में मोबाइल मेडिकल यूनिट, दवाओं का आपात भंडार, सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था, क्लोरीनेशन एवं जल परीक्षण की तत्काल क्षमता, संक्रामक रोगों की निगरानी और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की त्वरित तैनाती को आपदा प्रबंधन की मूल योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। आज भी हमारी तैयारी का बड़ा हिस्सा आपदा के दौरान बचाव पर केंद्रित रहता है। हमें आपदा के बाद के सात दिन, पंद्रह दिन और एक महीने की स्वास्थ्य चुनौती पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार करना होगा। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं का सवाल आपदा के समय और गंभीर हो जाता है। सामान्य दिनों में जिस दूरी को सड़क से कुछ घंटे में पूरा किया जा सकता है, आपदा के बाद वही दूरी कई दिनों की बन सकती है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना होगा कि जिला अस्पताल ही नहीं, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी आपदा-रोधी हों। अस्पतालों के पास वैकल्पिक बिजली व्यवस्था हो, ऑक्सीजन और आवश्यक दवाओं का पर्याप्त स्टॉक हो, आपात संचार व्यवस्था हो और गंभीर स्थिति में मरीजों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की पूर्व-निर्धारित योजना हो। यह भी जरूरी है कि अस्पतालों की आपदा-प्रबंधन क्षमता का नियमित ऑडिट हो। केवल कागज पर आपदा योजना बनाना पर्याप्त नहीं। उसका अभ्यास भी होना चाहिए। किसी बड़े भूकंप, बादल फटने या भूस्खलन की स्थिति में अस्पताल किस तरह काम करेगा? यदि सड़क बंद हो जाए तो दवाएं कैसे पहुंचेंगी? यदि अस्पताल की बिजली चली जाए तो कितने घंटे की वैकल्पिक व्यवस्था है? यदि एक साथ सैकड़ों घायल पहुंच जाएं तो ट्रायेज कैसे होगा? उत्तराखंड में मौसम और आपदा की चेतावनियां जारी होती हैं, लेकिन असली कसौटी यह है कि चेतावनी कितनी जल्दी और किस रूप में उस व्यक्ति तक पहुंचती है जो जोखिम वाले गांव में रह रहा है।

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