किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी ताकत उसके मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या गिरजाघर नहीं होते, बल्कि उन स्थानों के प्रति लोगों का विश्वास होता है। मंदिरों में चढ़ाया गया एक रुपया केवल मुद्रा नहीं होता, वह श्रद्धा का प्रतीक होता है। वह उस बुजुर्ग की जीवनभर की कमाई का अंश होता है, जिसने यह विश्वास किया कि उसका अर्पण धर्म, सेवा और लोककल्याण में लगेगा। वह उस किसान की मेहनत का फल होता है, जिसने अपनी पहली उपज ईश्वर को समर्पित की। वह उस मां की मनौती होती है, जिसने अपने बच्चे के स्वस्थ होने पर प्रसाद चढ़ाने का संकल्प लिया। इसलिए मंदिरों का चढ़ावा कभी केवल आर्थिक संसाधन नहीं रहा, वह समाज के नैतिक विश्वास की सबसे बड़ी पूंजी रहा है। लेकिन जब यही चढ़ावा घोटालों, अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की खबरों में बदलने लगे, तब प्रश्न केवल धन के दुरुपयोग का नहीं रह जाता, बल्कि आस्था की नींव पर पड़ती दरारों का बन जाता है। किसी मंदिर के दानपात्र से धन गायब होना, चढ़ावे के हिसाब-किताब में पारदर्शिता का अभाव या धार्मिक संस्थानों में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप—ये घटनाएं केवल प्रशासनिक विफलता नहीं हैं, बल्कि समाज के विश्वास पर सीधा आघात हैं।
भारत में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं। वे सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों के भी केंद्र रहे हैं। सदियों से मंदिरों के संसाधनों का उपयोग अन्नक्षेत्र, धर्मशालाओं, शिक्षा, चिकित्सा, गौसेवा और जरूरतमंदों की सहायता के लिए होता आया है। यही कारण है कि लोग बिना किसी संकोच के अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। उन्हें विश्वास होता है कि उनका दान किसी निजी तिजोरी में नहीं, बल्कि लोककल्याण के मार्ग पर खर्च होगा। दुर्भाग्य यह है कि समय-समय पर विभिन्न धार्मिक संस्थानों से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे हैं। कहीं चढ़ावे के लेखा-जोखा पर सवाल उठते हैं, कहीं संपत्तियों के प्रबंधन पर, तो कहीं दान की राशि के उपयोग पर। ऐसे मामलों में सबसे बड़ी क्षति किसी व्यक्ति या संस्था की नहीं, बल्कि उस सामूहिक विश्वास की होती है, जो वर्षों में बनता है और क्षणभर में टूट जाता है। यह भी समझना होगा कि भ्रष्टाचार का कोई धर्म नहीं होता। वह मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च—कहीं भी हो, उसका स्वरूप समान रूप से निंदनीय है। इसलिए धार्मिक संस्थानों की आलोचना को धर्म-विरोध के चश्मे से नहीं, बल्कि सुशासन और जवाबदेही के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। जो धन जनता की आस्था से आता है, उसका एक-एक पैसा जनता के विश्वास के अनुरूप खर्च होना चाहिए।
आज आवश्यकता केवल दोषियों को दंडित करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है, जिसमें भ्रष्टाचार की संभावना ही न्यूनतम रह जाए। मंदिरों में प्राप्त चढ़ावे का नियमित डिजिटल लेखा-जोखा, स्वतंत्र ऑडिट, आय-व्यय का सार्वजनिक प्रकटीकरण और आधुनिक वित्तीय प्रबंधन समय की मांग है। कई बड़े धार्मिक संस्थानों ने इस दिशा में सकारात्मक पहल भी की है। यदि इन व्यवस्थाओं को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत होगा। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि धार्मिक संस्थानों का संचालन व्यक्तिगत प्रभाव या बंद कमरों की संस्कृति से बाहर निकले। पारदर्शी ट्रस्ट व्यवस्था, स्पष्ट प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक सहभागिता किसी भी धार्मिक संस्था की विश्वसनीयता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। श्रद्धा जितनी पवित्र होती है, उसका प्रबंधन भी उतना ही निष्कलंक होना चाहिए।
चढ़ावे की चौखट पर उठते सवाल
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