समाज के सामने आने वाले खतरे हमेशा एक जैसे नहीं होते। कुछ खतरे दिखाई
देते हैं, कुछ अदृश्य होते हैं। कुछ बंदूक या बम के रूप में सामने आते हैं, तो कुछ
लापरवाही, अव्यवस्था और भ्रष्ट तंत्र के रूप में धीरे-धीरे जान लेते हैं। पिछले कुछ
दिनों की घटनाओं ने उत्तराखंड और देश को एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर किया
है कि नागरिक सुरक्षा का अर्थ केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि जीवन
के हर क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। उत्तराखंड
के कर्णप्रयाग स्थित नगरासू में निहंग श्रद्धालुओं से
जुड़ा मामला हो, प्रदेश के पुलिस थानों को बम से
उड़ाने की धमकी का मामला हो या फिर देश के
विभिन्न हिस्सों में कोचिंग सेंटरों और व्यावसायिक
भवनों में लगने वाली आग में दम तोड़ते मासूम बच्चे-
ये घटनाएं पहली नजर में भले अलग-अलग दिखें,
लेकिन इन सभी की जड़ में एक समान प्रश्न छिपा है।
वह प्रश्न है – क्या हमारी व्यवस्था संभावित खतरों को
समय रहते पहचानने और उनसे निपटने के लिए
पर्याप्त रूप से तैयार है ?
नगरासू की घटना ने यह स्पष्ट किया कि संवेदनशील प्रदेशों में छोटी सी चूक भी
सामाजिक तनाव का कारण बन सकती है। वहीं पुलिस थानों को बम से उड़ाने की
धमकी ने यह याद दिलाया कि सुरक्षा एजेंसियों को आज केवल जमीन पर नहीं, बल्कि
डिजिटल और मनोवैज्ञानिक मोर्चों पर भी चौकन्ना रहना पड़ता है। आतंक और अफवाह
का उद्देश्य हमेशा विस्फोट करना नहीं होता, बल्कि लोगों के मन में भय पैदा करना भी
होता है। इसलिए ऐसी धमकियों को हल्के में लेना किसी भी जिम्मेदार शासन के लिए
संभव नहीं है। लेकिन इन घटनाओं के बीच एक और भयावह सच सामने खड़ा है,
जो शायद किसी बम की आवाज नहीं करता, फिर भी हर साल अनेक जिंदगियां निगल
जाता है । वह है सार्वजनिक स्थलों, कोचिंग सेंटरों, अस्पतालों और व्यावसायिक भवनों
में सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी । देश के कई शहरों में हुए अग्निकांडों में जिन बच्चों
ने अपनी जान गंवाई, वे किसी अपराध या दुर्घटना का हिस्सा नहीं थे। वे अपने सपनों
को पूरा करने के लिए कोचिंग सेंटर गए थे। लेकिन संकरी गलियां, अवैध निर्माण, बंद
निकास द्वार और कागजों में पूरी की गई सुरक्षा व्यवस्थाएं उनके लिए मौत का जाल
बन गईं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का हालिया रुख महत्वपूर्ण हो जाता
है। प्रदेशभर के अस्पतालों, कोचिंग सेंटरों, होटलों, मॉल और अन्य सार्वजनिक भवनों
का फायर सेफ्टी ऑडिट कराने तथा नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के
उनके निर्देश केवल प्रशासनिक आदेश नहीं हैं। यह उस सोच का संकेत है जिसमें सुरक्षा
को विकास का अनिवार्य हिस्सा माना गया है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और तेजी
से विकसित होते प्रदेश में यह समझना होगा कि सुरक्षा कोई अलग विषय नहीं है। कानून-
व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, अग्नि सुरक्षा, भवन मानक और सामाजिक सद्भाव- ये सभी
एक ही श्रृंखला की कड़ियां हैं।
सजगता ही सबसे बड़ी सुरक्षा
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