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Hindavi Tarangini > Editor's Pick > वायदों का मौसम लौट आया
Editor's Pickउत्तराखंडराजनीति

वायदों का मौसम लौट आया

Akshat Jain
Last updated: July 17, 2026 1:48 pm
Akshat Jain
Published: July 17, 2026
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उत्तराखंड की राजनीति में अभी विधानसभा चुनावों की औपचारिक घोषणा भले दूर हो, लेकिन राजनीतिक माहौल यह संकेत देने लगा है कि चुनावी रणभूमि की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों का लेखा-जोखा लेकर जनता के बीच जाने की रणनीति बना रहा है, तो विपक्ष सरकार की नीतियों और फैसलों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो चुका है, राजनीतिक बयानबाजी धार पकड़ रही है और विभिन्न दल अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को साधने में जुट गए हैं। स्पष्ट है कि उत्तराखंड में चुनावी बिसात बिछ चुकी है। लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच जवाबदेही का सबसे बड़ा मंच भी होते हैं। इसलिए चुनावी सक्रियता स्वाभाविक है। लेकिन चिंता तब पैदा होती है, जब विकास का विमर्श पीछे छूट जाता है और उसकी जगह केवल राजनीतिक शोर, व्यक्तिगत आरोपों और भावनात्मक मुद्दों का बोलबाला होने लगता है।
उत्तराखंड एक युवा राज्य है। स्थापना के 25 वर्ष पूरे करने की ओर बढ़ रहा यह प्रदेश आज विकास के ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे अगले दो दशकों की दिशा तय करनी है। पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन, सीमांत क्षेत्रों का विकास, रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, पर्यटन, कृषि, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और बुनियादी ढांचे का विस्तार ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर गंभीर राजनीतिक बहस की अपेक्षा है। दुर्भाग्य से चुनावी मौसम आते ही अक्सर ये मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं और उनकी जगह तात्कालिक राजनीतिक विवाद सुर्खियां बन जाते हैं। राजनीतिक दलों की सक्रियता लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है, बशर्ते वह जनहित के एजेंडे पर आधारित हो। सत्ता पक्ष स्वाभाविक रूप से अपनी उपलब्धियों को जनता के सामने रखेगा। वह सड़क, रेल, स्वास्थ्य, निवेश, पर्यटन, रोजगार, चारधाम यात्रा, समान नागरिक संहिता, सीमांत विकास और प्रशासनिक सुधार जैसे मुद्दों को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करेगा। दूसरी ओर विपक्ष इन दावों की पड़ताल करेगा, अधूरे वादों, बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर सरकार से जवाब मांगेगा। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान भी है। लेकिन राजनीति तब कमजोर पड़ जाती है, जब बहस तथ्यों के बजाय आरोपों और प्रचार तक सीमित हो जाती है। उत्तराखंड ने पिछले वर्षों में कई ऐसे चुनाव देखे हैं, जहां विकास के गंभीर प्रश्नों की अपेक्षा राजनीतिक बयानबाजी अधिक चर्चा में रही। परिणाम यह हुआ कि चुनाव समाप्त होने के बाद भी अनेक मूल समस्याएं जस की तस बनी रहीं।
प्रदेश की सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियां देश के अधिकांश राज्यों से अलग हैं। यहां विकास का अर्थ केवल नई सड़कें बनाना नहीं है, बल्कि उन गांवों तक जीवन की मूलभूत सुविधाएं पहुंचाना भी है, जहां आज भी लोग बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं। सीमांत क्षेत्रों को आबाद रखना राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है। ऐसे में चुनावी बहस का केंद्र इन मुद्दों को होना चाहिए। युवा मतदाता इस चुनावी दौर का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष होंगे। उत्तराखंड की बड़ी आबादी युवा है, जो रोजगार, कौशल विकास, स्टार्टअप, डिजिटल अवसरों और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट जवाब चाहती है।
उत्तराखंड की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष नेतृत्व का प्रश्न भी है। विभिन्न दल अपने संगठन को मजबूत करने, नए चेहरों को आगे लाने और सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटे हैं। टिकट वितरण से लेकर क्षेत्रीय संतुलन तक, हर निर्णय राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनेगा। लेकिन अंतत: जनता वही नेतृत्व स्वीकार करेगी, जो केवल चुनावी वादे नहीं, बल्कि विश्वसनीयता और कार्यक्षमता का भरोसा भी दे सके। आज सोशल मीडिया ने चुनावी राजनीति का स्वरूप भी बदल दिया है। सूचना की गति पहले से कहीं अधिक तेज है, लेकिन इसके साथ भ्रामक सूचनाओं और आधे-अधूरे तथ्यों का खतरा भी बढ़ा है।

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