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Reading: देशभर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव हर्षोल्लास से मनाया:डॉ.रेनूशरण
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Hindavi Tarangini > उत्तराखंड > देशभर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव हर्षोल्लास से मनाया:डॉ.रेनूशरण
उत्तराखंड

देशभर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव हर्षोल्लास से मनाया:डॉ.रेनूशरण

Akshat Jain
Last updated: September 4, 2026 4:38 pm
Akshat Jain
Published: September 4, 2026
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हल्द्वानी।

सरस्वती देवी मैमोरियल ट्रस्ट के तत्वावधान में विभिन्न स्थानों पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनायी। डॉ.रेनूशरण ने कहा श्रीकृष्ण जन्म के 5254 वर्ष: द्वापर से कलियुग तक की यात्रा सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण केवल एक देवता नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला हैं। उनका जन्म एक तिथि नहीं, एक युग का परिवर्तन है। मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, रोहिणी नक्षत्र में, रात्रि के ठीक 12 बजे, मथुरा के कारागार में हुआ था।

पौराणिक गणनाओं और ज्योतिषीय शोध के अनुसार यह दिव्य घटना 3228 ईसा पूर्व में घटी थी। यदि हम वर्तमान वर्ष 2026 से इसकी गणना करें तो 3228 + 2026 = 5254 वर्ष होते हैं। अर्थात इस वर्ष हम श्रीकृष्ण का 5254वां जन्मोत्सव मनाने जा रहे हैं। यह केवल एक संख्या नहीं है, यह सनातन संस्कृति की अखंडता का प्रमाण है।

जन्म की अलौकिक परिस्थितियाँ

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार उस समय मथुरा पर अत्याचारी कंस का शासन था। आकाशवाणी हुई थी कि देवकी का आठवां पुत्र ही कंस का वध करेगा। इसलिए कंस ने अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को कारागार में डाल दिया।

भादों की अंधेरी रात, मूसलाधार वर्षा हो रही थी। अष्टमी तिथि थी, रोहिणी नक्षत्र अपने पूर्ण प्रभाव पर था, चंद्रमा वृषभ राशि में उच्च का था और ठीक मध्यरात्रि में, जब चारों ओर घोर अंधकार और भय का साम्राज्य था, तब कारागार में दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। चतुर्भुज रूप में भगवान विष्णु ने दर्शन दिए और फिर बालक कृष्ण के रूप में प्रकट हुए।

जन्म के साथ ही माया का प्रभाव बढ़ा, पहरेदार सो गए, कारागार के ताले टूट गए और वसुदेव जी टोकरी में बालक कृष्ण को लेकर यमुना पार गोकुल में नंद बाबा के घर ले गए। वहाँ यशोदा माता ने उनका लालन-पालन किया।

3228 ईसा पूर्व की वैज्ञानिकता

आज कई लोग पूछते हैं कि 3228 ईसा पूर्व का सटीक निर्धारण कैसे हुआ? इसका आधार केवल आस्था नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान भी है। महाभारत और भागवत पुराण में ग्रहों की जो स्थितियाँ बताई गई हैं, जब आधुनिक प्लेनेटेरियम सॉफ्टवेयर पर उन्हें डाला जाता है तो वह स्थिति 3228 ईसा पूर्व की 19 जुलाई की मध्यरात्रि से मेल खाती है।

उस दिन अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृषभ राशि में चंद्रमा और सप्तर्षि नक्षत्र की वही स्थिति थी जिसका वर्णन ग्रंथों में है। इसीलिए विद्वानों ने इस तिथि को सबसे प्रमाणिक माना है।

5254 वर्षों बाद भी क्यों प्रासंगिक हैं श्रीकृष्ण?

आज 5254 वर्ष बीत जाने के बाद भी कृष्ण हमारे बीच हैं। क्यों?

गीता का ज्ञान: कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया गया उनका गीता उपदेश आज भी विश्व के सबसे बड़े मैनेजमेंट और मनोविज्ञान का ग्रंथ है। जब अर्जुन विषाद में थे, तब कृष्ण ने कर्मयोग का मार्ग दिखाया।

सोलह कलाओं के स्वामी: श्रीकृष्ण ही एकमात्र ऐसे अवतार हैं जो सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं। उनमें प्रेम भी है, युद्ध भी है, राजनीति भी है और बालसुलभ नटखटपन भी है।

युग परिवर्तन के प्रतीक: उनका जन्म अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है। आज भी जब समाज में अन्याय, भ्रष्टाचार और अधर्म बढ़ता है तो लोग कृष्ण के आने की कामना करते हैं।

2026 की जन्माष्टमी का महत्व

इस वर्ष भाद्रपद कृष्ण अष्टमी का पर्व केवल एक व्रत-त्यौहार नहीं रहेगा, बल्कि यह 5254 वर्षों की सनातन यात्रा का उत्सव होगा। उत्तराखंड कैलाश पर्वत जैसे पवित्र द्वार से लेकर मथुरा-वृंदावन तक इस बार भक्तों में विशेष उत्साह देखने को मिलेगा। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति कितनी प्राचीन और कितनी वैज्ञानिक है।

अंत में यही कहूँगी कि कृष्ण को समझना है तो उन्हें मंदिर में नहीं, अपने कर्म में ढूंढो। यदि जीवन में प्रेम करना है तो राधा से सीखो, मित्रता करनी है तो सुदामा से सीखो, और धर्म के लिए लड़ना है तो गीता के कृष्ण से सीखो।

5254 वर्षों के बाद भी मुरली की धुन वही है, बस सुनने वाला हृदय चाहिए।

इस अवसर पर कार्यक्रम में बच्चों को 108 बार ओम नमो भगवते वासुदेवाय का मन्त्रोच्चारण किया। सभी माताओं बहनों ने कृष्ण लीला, संकीर्तन, भजन,प्रतियोगिता में भाग लिया सभी उपस्थित जन को भोग प्रसाद, फल,दक्षिणा भेंटकर सम्मानित किया।इस पावन अवसर पर मोनिका भारती,गीता पांडे,पम्मी तिवारी,मीना राणा सहित ट्रस्ट के सभी सम्मानित गणमान्य और शहर को तमाम जन मौजूद रहे।

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