नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को जुटा ब्रिक्स सिर्फ एक शिखर सम्मेलन नहीं था। यह बदलती हुई दुनिया का एक आईना भी था। ऐसी दुनिया, जहां पुरानी महाशक्तियों का प्रभाव अब भी कायम है, लेकिन उसके समानांतर नए शक्ति-केंद्र अपनी जगह बना रहे हैं। पश्चिम एशिया का संघर्ष, रूस और ईरान पर दबाव, बढ़ते व्यापारिक तनाव, आपूर्ति शृंखलाओं की अस्थिरता और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को लेकर उठते सवालों के बीच भारत ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। सम्मेलन के अंत में 140 बिंदुओं वाला नई दिल्ली घोषणापत्र सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या दिल्ली से निकला ब्रिक्स का संदेश किसी नई विश्व-व्यवस्था की शुरुआत का संकेत है या फिर बहुध्रुवीयता के नाम पर चल रही एक और कूटनीतिक कवायद? इसका सीधा उत्तर अभी संभव नहीं है। लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि ब्रिक्स अब वह छोटा-सा आर्थिक समूह नहीं रहा, जिसकी कल्पना करीब दो दशक पहले की गई थी। आज इसके 11 सदस्य देश दुनिया की करीब आधी आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन यहीं एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या आकार ही शक्ति का प्रमाण है? शायद नहीं। किसी समूह में अधिक देशों का शामिल होना उसकी सामूहिक प्रभावशीलता की गारंटी नहीं देता। ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है और यही विविधता उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकती है।
ब्रिक्स को सीधे-सीधे अमेरिका या पश्चिम के खिलाफ किसी मोर्चे के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। सदस्य देशों के हित, राजनीतिक व्यवस्थाएं और रणनीतिक प्राथमिकताएं एक-दूसरे से काफी अलग हैं। फिर भी नई दिल्ली घोषणापत्र में एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्कीय व्यापारिक बाधाओं तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के विपरीत एकतरफा प्रतिबंधों पर गंभीर चिंता जताई गई है। विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप अधिक खुली, न्यायपूर्ण और पूर्वानुमेय व्यापार व्यवस्था की जरूरत पर भी जोर दिया गया है। यानी ब्रिक्स फिलहाल टकराव का औपचारिक मंच बनने के बजाय विकल्पों की तलाश का मंच बनता दिखाई देता है। यही अंतर भारत के लिए खास मायने रखता है। भारत के लिए अमेरिका और यूरोप आर्थिक, तकनीकी, निवेश और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर चीन और रूस के साथ भी उसके व्यापक संबंध हैं। ऐसे में भारत की विदेश नीति का प्रश्न किसी एक खेमे का चुनाव करना नहीं, बल्कि बदलते शक्ति-संतुलन के बीच अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना है। दिल्ली सम्मेलन का एक अहम पहलू भारत-चीन संबंध भी रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात में दोनों देशों ने व्यापार, संपर्क और संबंधों में सुधार की दिशा में आगे बढ़ने की बात की। लेकिन सीमा का प्रश्न अब भी इस रिश्ते की बुनियादी कसौटी है। रिपोर्टों के अनुसार मोदी ने स्पष्ट किया कि व्यापक संबंधों में आगे बढ़ने के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता जरूरी है। इसलिए इस मुलाकात को न तो संबंधों में किसी निर्णायक बदलाव का प्रमाण माना जा सकता है और न ही महज औपचारिकता। इसे प्रतिस्पर्धा और संवाद के बीच संतुलन तलाशने की कोशिश के रूप में देखना अधिक उचित होगा। चीन के साथ व्यापार बढ़ाना एक बात है और रणनीतिक निर्भरता से बचना दूसरी। संवाद बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके साथ सुरक्षा और आर्थिक हितों के प्रति सतर्कता भी उतनी ही जरूरी है।
आतंकवाद के सवाल पर भी दिल्ली सम्मेलन भारत के लिए महत्वपूर्ण रहा। नई दिल्ली घोषणापत्र में अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की स्पष्ट निंदा की गई और आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’, आतंकवादी सुरक्षित ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई तथा जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही की बात कही गई। चीन समेत ब्रिक्स के सदस्य देशों का इस भाषा पर सहमत होना भारत के लिए कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन यहां भी शब्दों और कार्रवाई के बीच का अंतर समझना होगा। घोषणापत्र में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया और न ही भारत की सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया गया। इसका अर्थ यही है कि ब्रिक्स के भीतर आतंकवाद पर सहमति की एक सीमा है। सदस्य देशों के अलग-अलग रणनीतिक हित जहां टकराते हैं, वहां साझा भाषा स्वाभाविक रूप से अधिक सावधान हो जाती है।
कूटनीति की असली परीक्षा इसलिए घोषणाओं में नहीं, बल्कि उनके बाद होने वाली ठोस कार्रवाई में होगी। पश्चिम एशिया का संकट ब्रिक्स की इसी सीमा को और स्पष्ट करता है। एक ही मंच पर ऐसे देश मौजूद हैं, जिनके क्षेत्रीय और रणनीतिक हित कई मुद्दों पर अलग-अलग हैं। इसके बावजूद घोषणापत्र में संघर्षों को बढ़ाने वाले कदमों से बचने, संयम और कूटनीति पर जोर दिया गया। यह सहमति महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इससे ब्रिक्स को ऐसी संस्था नहीं माना जा सकता जिसके पास किसी युद्ध को रोक देने की संस्थागत शक्ति हो। ब्रिक्स के पास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी निर्णयकारी संरचना नहीं है, न नाटो जैसी सैन्य व्यवस्था और न यूरोपीय संघ जैसी एकीकृत आर्थिक-संस्थागत प्रणाली। इसलिए उसकी भूमिका को उसकी वास्तविक क्षमताओं के संदर्भ में ही समझना होगा। उसकी ताकत शायद किसी युद्ध को रोकने में नहीं, बल्कि उन देशों को एक साझा मंच देने में है जो वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व और विकासशील देशों के लिए अधिक वित्तीय, तकनीकी और व्यापारिक अवसर चाहते हैं।
नई विश्व-व्यवस्था की दस्तक या शक्ति-संतुलन की नई कवायद
Leave a Comment




