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Reading: फर्जी खबरों पर अदालत का बड़ा प्रहार, सिद्धार्थ अग्रवाल के खिलाफ दुष्प्रचार पर लगाई रोक
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Hindavi Tarangini > उत्तराखंड > फर्जी खबरों पर अदालत का बड़ा प्रहार, सिद्धार्थ अग्रवाल के खिलाफ दुष्प्रचार पर लगाई रोक
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फर्जी खबरों पर अदालत का बड़ा प्रहार, सिद्धार्थ अग्रवाल के खिलाफ दुष्प्रचार पर लगाई रोक

Akshat Jain
Last updated: June 21, 2026 1:09 pm
Akshat Jain
Published: June 21, 2026
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आज के डिजिटल युग में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को धूमिल करना बहुत ही आसान है। किसी व्यक्ति या संस्था के विषय में किसी के मन–मस्तिष्क में कोई ख्याल आया और उसने उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया, उसका वीडियो अपलोड कर दिया। अब उस बात का सत्य से कोई वास्ता हो न हो लेकिन जिसके खिलाफ वह की गई है उसकी तो बनी–बनाई इज्जत दांव पर लग जाती है।

ऐसी दुर्भावना से प्रेरित किसी को बदनाम करने के लिए फैलाई जाने वाली फर्जी खबरों पर एक अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाते हुए, देहरादून के माननीय न्यायालय (प्रभारी जिला न्यायाधीश) ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। यह फैसला भारतीय जनता पार्टी के देहरादून महानगर अध्यक्ष, प्रतिष्ठित व्यवसायी और समाजसेवी श्री सिद्धार्थ उमेश अग्रवाल के पक्ष में सुनाया गया है। अदालत ने सभी प्रमुख बहुराष्ट्रीय टेक कंपनियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि वे श्री अग्रवाल के खिलाफ फैलाई जा रही भ्रामक, मनगढ़ंत और मानहानिकारक सामग्री को तत्काल प्रभाव से रोकें।

कौन हैं सिद्धार्थ उमेश अग्रवाल?

श्री सिद्धार्थ उमेश अग्रवाल एक जाने-माने व्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने जन कल्याण और विकास के समग्र मिशन में राजनीति, समाज सेवा और व्यापारिक नेतृत्व को सहजता से मिश्रित किया है।

वर्तमान में श्री अग्रवाल भारतीय जनता पार्टी के देहरादून महानगर अध्यक्ष भी हैं और अपने व्यक्तिगत दायित्वों के साथ ही पार्टी के दायित्वों को भी निभा रहे हैं। सुशासन, नैतिक उद्यमशीलता और समावेशी विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए पहचाने जाने वाले श्री अग्रवाल युवाओं के लिए एक आदर्श और प्रगतिशील नेता के रूप में जाने जाते हैं। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, उनका एक अत्यंत बेदाग रिकॉर्ड रहा है और उनके खिलाफ अतीत में कोई भी आपराधिक या दीवानी मुकदमा लंबित नहीं था।

क्या था मामला?

8 सितंबर 2025 को सोशल मीडिया पर फैलाई गई खबरों के अनुसार 197-बी, राजपुर रोड, देहरादून स्थित संपत्ति ‘सिद्धार्थ बिल्डवेल एलएलपी’ जिसके मालिक श्री सिद्धार्थ अग्रवाल हैं वहाँ एंटी-नारकोटिक्स का छापा पड़ा है क्योंकि वहाँ पर ‘रेव पार्टी’ चल रही थी तथा वहाँ पर कई सारी अवैध सामग्रियां जब्त की गईं और इस मामले में कई गिरफ्तारियां भी हुई हैं।

कई मीडिया घरानों, वेब पोर्टल्स और सोशल मीडिया पेजों ने एक सुनियोजित एजेंडे के तहत झूठा नैरेटिव फैलाना शुरू कर दिया।
कानूनी रूप से कोई कार्रवाई न होने और पुलिस की क्लीन चिट होने के बावजूद इस दुष्प्रचार में श्री अग्रवाल की छवि खराब करने के लिये AI द्वारा जनरेटेड और एडिट किए गए फर्जी वीडियो का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। श्री अग्रवाल द्वारा प्रेस में स्पष्टीकरण जारी किए जाने के बाद भी, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और कुछ व्यक्तियों ने इस खबर को प्रसारित करना जारी रखा।

सच क्या है?

सोशल मीडिया पर चलाई खबरों से सच्चाई पूरी तरह से अलग है। 197-बी, राजपुर रोड, देहरादून स्थित संपत्ति ‘सिद्धार्थ बिल्डवेल एलएलपी’ के स्वामित्व में है, जिसमें श्री सिद्धार्थ अग्रवाल एक भागीदार हैं। इस संपत्ति को जुलाई 2025 में श्री रोहन कपूर को किराए पर दिया गया था।

7 सितंबर 2025 की रात को इस संपत्ति पर श्री कपूर का एक निजी पारिवारिक समारोह चल रहा था। रात लगभग 11:30 बजे, श्री कुश मिश्रा (आईपीएस), जो स्वयं को एक पुलिस अधिकारी बता रहे थे और बिना किसी वैध सर्च वारंट, अधिकार या पूर्व अनुमति के, कई सशस्त्र व्यक्तियों के साथ जबरन इस निजी संपत्ति में प्रवेश कर गए और कमरों में घुसने का प्रयास किया।

जब श्री अग्रवाल को श्री कपूर द्वारा इस घटना की सूचना मिली तो स्थिति की गंभीरता को समझते हुए वे तुरंत अपनी संपत्ति पर पहुंचे और स्थानीय पुलिस को भी मौके पर बुलाया। मौके पर पहुंची स्थानीय पुलिस ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें ऐसे किसी भी ‘अधिकृत छापे’ की कोई जानकारी नहीं है। इस पूरी घटना के दौरान न तो कोई एफआईआर दर्ज हुई, न कोई गिरफ्तारी हुई, न किसी प्रकार की अवैध सामग्री की जब्ती हुई और न ही कोई मेडिकल परीक्षण सकारात्मक पाया गया। उपस्थित सभी मेहमानों को चिकित्सकीय रूप से फिट पाए जाने के बाद स्वतंत्र रूप से जाने दिया गया।

पुलिस विभाग का आधिकारिक स्पष्टीकरण और क्लीन चिट

अफवाहों को जड़ से खत्म करने के लिए देहरादून जिला पुलिस का आधिकारिक पत्र एक अहम साक्ष्य है। देहरादून जिला पुलिस ने उस पत्र के माध्यम से आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट कर दिया है कि 7 सितंबर की कथित घटना के संबंध में कभी भी कोई एफआईआर, सर्च वारंट, प्राधिकरण, आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 165 के तहत तलाशी की कार्यवाही, पंचनामा, जब्ती, गवाहों की संलिप्तता, हथियार जारी करने, महिला पुलिस की तैनाती या मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट जैसी कोई भी वैधानिक प्रक्रिया अस्तित्व में नहीं थी। रिकॉर्ड यह निर्णायक रूप से स्थापित करते हैं कि कुश मिश्रा ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बिना अनुमति के श्री अग्रवाल की निजी संपत्ति में अवैध रूप से प्रवेश किया था।

न्यायालय का कड़ा रुख और कानूनी लड़ाई (सिविल रिवीजन 06/2026)

अपनी सामाजिक और राजनीतिक साख को हो रहे इस अपूरणीय नुकसान के खिलाफ श्री अग्रवाल ने दीवानी न्यायाधीश (वरिष्ठ श्रेणी), देहरादून के समक्ष ‘मूल वाद संख्या 467/2025’ दायर किया। उन्होंने सोशल मीडिया कंपनियों (Google, YouTube, Facebook, Instagram, X) को नोटिस भी भेजे, लेकिन उन्होंने इस सामग्री को नहीं हटाया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए श्री अग्रवाल ने न्यायालय के समक्ष एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। निचली अदालत द्वारा इस पर तुरंत आदेश न दिए जाने के कारण, यह मामला प्रभारी जिला न्यायाधीश श्री महेश चंद्र कौशिक की अदालत में पहुंचा।

न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई करते हुए भारतीय न्यायपालिका के कई ऐतिहासिक फैसलों जैसे– ‘आर. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य (1994)’ और ‘हनुमान बेनीवाल बनाम विनय मिश्रा (2024)’ के मामलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। किसी भी राजनीतिक या सामाजिक कार्यकर्ता की जीवन भर की मेहनत से बनाई गई प्रतिष्ठा को महज कुछ ‘तुच्छ और दुर्भावनापूर्ण’ बयानों या सोशल मीडिया पोस्ट्स के जरिए धूमिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को निजता का अधिकार है। बिना सहमति के किसी के पारिवारिक या निजी जीवन से जुड़ी भ्रामक खबरें छापना इस अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

अंतिम फैसला और टेक कंपनियों को निर्देश

न्यायालय ने श्री अग्रवाल के तर्कों को स्वीकार करते हुए माना कि प्रथम दृष्टया यह मामला उन्हीं के पक्ष में है और इस दुष्प्रचार से उन्हें ऐसी अपूरणीय क्षति हो रही है जिसकी भरपाई आर्थिक रूप से नहीं की जा सकती। न्याय के हित में और सीपीसी की धारा 151 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, अदालत ने आदेश दिया कि “सभी न्यूज़ पोर्टल्स, यूट्यूब चैनल संचालकों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, व्हाट्सएप ग्रुप एडमिन और आम जनता को स्पष्ट रूप से चेतावनी दी जाती है कि श्री सिद्धार्थ अग्रवाल के खिलाफ ‘7 सितंबर 2025’ की घटना से जुड़ी कोई भी फर्जी, भ्रामक, या मानहानिकारक खबर छापना, वीडियो पोस्ट करना, उसे लाइक, शेयर या फॉरवर्ड करना माननीय न्यायालय के आदेशों की सीधी अवमानना मानी जाएगी।

यदि कोई भी व्यक्ति या संस्था भविष्य में इंटरनेट या किसी अन्य माध्यम पर ऐसी दुर्भावनापूर्ण सामग्री फैलाता हुआ पाया गया, तो उसके खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियम 2021 के प्रावधानों, मानहानि कानूनों और न्यायालय की अवमानना के तहत अति-सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।”

यह निर्णय इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का हनन करने की छूट किसी को नहीं है।

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